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वक्त के साथ सब बदल जाता है.. बालक जवान होता है, अपनी गृहस्थी बसाता है.. कल तक सब चीजें टेढ़ी खीर लगती थी.. घर चलाना, पैसा कमाना बहुत बडी कला लगते थे.. पर वक्त सब सिखा देता है.. बच्चे जब छोटे होते हैं तो हर बात की शिकायत करते हैं.. मेरे दोस्त के पास वो वाली वीडियो गेम है, क्लास के सब बच्चों के पास वो वाला बैग है, सब पड़ोसियों के घरों में लैपटाप है.. यही शिकायतें बात मनाने का तरीका होती हैं.. आप मुझे कुछ नही दिलाते, यह कहकर बालक मुँह फुला लेता है.. घर वालों को जैसे कैसे करके वो चीज लानी पड़ती है..

पर जब वो बच्चा बडा होता है तो क्या करे? बहुत सी तमन्ना होती हैं.. मेरे सब दोस्त घूमने जाते हैं, सबके पास कार है, पर किससे शिकायत करे? जिम्मेदार आदमी शिकायत नहीं किया करता.. हमारे माँ बाप के मन में भी बहुत खाहिशें होती हैं पर कह नही पाते.. किससे कहें? किससे शिकायत करें? किससे नाराज हो?

अब भाजपा को ले लो.. वो मानते ही नहीं कि हम बड़े हो गए.. शिकायत लगाते हैं कि सोनिया का हेलिकॉप्टर घोटाले में नाम आया है.. शिकायत लगाते हैं कि सैकड़ों करोड का घोटाला है.. पर हे मेरे मालिक , अब आप विपक्ष में नही.. पिछली सीटों पर बैठकर सोने के दिन अब गए.. अब आप ड्राइवर सीट पर बैठे हैं.. बचपन गयो, आई रे जवानी.. अब जिम्मेदार बनो, कमेटी बनाओ, साबित करो, जेल भेजो.. वाडरा को भी, सोनिया को भी, मालया को भी..
अब जेल भेजना आपकी मर्जी नही,डयूटी है.. अब भ्रष्टाचार करने वालेके साथ, आप पर भी सवाल उठेंगे.. जल्दी कमेटी बनाओ, जाँच कराओ.. अब गेंद सोनिया के नही, आपके पाले में है.. जल्द शाट मारो वरना आउट हो जाओगे..

इब नयू कहका काम कोनी चलदा कि हरियाणा मा जाट दंगा कांग्रेस ना कराया.. हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है.. हाथ पर हाथ रखकर काम नी चलेगा.. जल्दी कांग्रेस को सजा दो वरना हम तो आपको ही दोषी मानेंगे..

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गर्मी चरम पर है, दोपहर में पारा 45 को छूता है.. गरम लू बदन को कंपाती जाती है, भगवान न करे किसी को ऐसी दोपहरी में घर से निकलना पडे.. भगवान न करे ऐसी दोपहरी में कोई रिक्शा चलाए, भगवान न करे ऐसी दोपहरी में कोई ईंटे ढोए, कोई सडक पर वजन खींचे..

ऐसी दोपहरी में कोई अपनी छोटी सी रेहडी लेकर धूप में खडा रहे और हम बडी दुकान में जाकर कोका कोला पी लें? कोई दोपहर में जलते बदन हमें रिक्शा से ढोए और हम कहें कि क्यों बे लालची, ठग, तीस रूपये माँगता है? बीस दूंगा, लेना है तो बोल..

एक तरफ बडी कंपनियों, सेठों के पेट निकलते जाते हैं.. दूसरी तरफ गरीबों का सफाया हुआ जाता है.. वैसे ठीक भी है, ना रहे बाँस, ना बजे बाँसुरी.. ना रहे गरीब, ना रहे गरीबी.. बडा कष्टदायी है कि हम सब लोग बडी दुकानों पर दौड़ कर चढते हैं, वेटर को बीस रूपये टिप ना दें तो शर्म आए..

गरीब की दुकान ग्राहक का इंतजार करती रह जाती है.. उसके साथ बडा मोल भाव किया जाता है.. उस फटे चप्पल वाले को ठग बोला जाता है.. हमें सोचना चाहिए..

मैने तो सीधा फंडा बनाया हुआ है.. आस पास के सब रेहडी वालों से अपनी यारी है.. एक गन्ने के जूस वाला है, बडा गरीब है.. मैं रोज अपने एक दो मित्रों को लेकर जाता हूँ, उसके पचास रूपये जरूर बनवाकर आता हूँ.. एक परांठे वाली दीदी है, उससे मेरी दोस्ती एक साल पुरानी है.. बडे मस्त परांठे बनाती है, दस का एक.. मैने लड झगड कर पंद्रह देना शुरू किया हुआ है.. एक केले वाला भाई है, दस के तीन केले देता है.. मैं रोज जाता हूँ, दस के दो ही लेता हूँ.. एक चाचा बडा बुजुर्ग है, उससे भी हर हफ्ते सिर की मालिश करा लेता हूँ.. एक भुटटे वाला है, करारे भुटटे बेचता है.. चार चार लड़कियाँ हैं, उसकी.. मैने बहुत जोर लगाया, भाई इनका स्कूल में दाखिला करा दे.. कापी पैन बसता भी लाके दिया पर उस अनाडी ने दाखिला नी कराया.. रब जाने चालाक है या भोला.. खैर.. कोला पिए जमाना हो गया, आइसक्रीम का भी शौक नही.. पिजजा भी नी खाता.. बडे सेठों को एक एक पैसा देते मेरे हाथ कांपते हैं.. हाँ, उनकी दुकान पर सफाई करने वाली चाची को जरूर कभी चुपके से बीस तीस रूपये पकडा देता हूँ..

मानता हूँ, गरीबी मेरे मिटाए ना मिटेगी.. वो दस बीस रूपये उसके एक वक्त की सब्जी भी न खरीद पाएँगे.. पर अच्छा लगता है.. सिर थोड़ा सा उठ जाता है, मिजाज खुश हो जाता है.

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किसी भी संगठन की ताकत उसके सदस्य होते हैं.. एक एक सदस्य का आचरण एवं व्यवहार मिलकर ही उस संगठन का गुण निर्धारित होता है.. एक एक फौजी अनुशासित है तो भारत की फौज अनुशासित है.. एक एक आदमी डेमोक्रेटिक विचारों में विश्वास रखता है तो भारत डेमोक्रेटिक है.. ज्यादातर लोग छुआछूत के खिलाफ हैं तो छुआछूत मिटी जाती है..

हर संगठन की ताकत उसके लोग हैं.. जैसे लोग, वैसा संगठन..

अब भाजपा के समर्थक लोगों की बात करते हैं.. ज्यादातर समर्थक, आर.एस. एस. के भी समर्थक हैं.. सोशल मीडिया पर उनका आचरण गाली गलौच और हिंसक बातों से भरा है.. मुसलमानों के तो वो विरोधी हैं ही, वो गणतंत्र के भी खिलाफ लगते हैं.. सब समाजों की बजाय, अकेले हिंदू समाज को बनाने की बात करते हैं . गाँधीजी को ढोंगी मानते हैं, गोडसे के समर्थन में तथ्य जुटाते दिखते हैं.. और भी कितनी बातें हैं, जहाँ भाजपा के आम समर्थक असंवैधानिक बात करते हैं..

ऐसे में जब मोदी जी कहते हैं कि हम गांधी और अंबेडकर के आदर्शों पर चलते हैं तो जरूर झूठ बोलते हैं.. जब कहते हैं कि हम संविधान और सेल्यूलर विचारों के समर्थक हैं तो जरूर झूठ बोलते हैं.. जरूर झूठ बोलते हैं..

कोई संगठन, अपने समर्थकों से अलग नही हो सकता.. जरूर मोदी जी के असली आदर्श वही हैं, जो उसके आम सदस्यों के हैं.. बस खुद को नकली खाल में ढके बैठे हैं.. जरूर भेड की खाल में भेडिया है.

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भारत और पश्चिम की शादियों में बडा फर्क है.. पश्चिम वाले सिर्फ बंदे की अच्छाई से शादी करते हैं,बदन और रूप से शादी करते हैं, अच्छे व्यवहार से शादी करते हैं.. जैसे ही बुराई दिखनी शुरू होती है तो तलाक.. तभी तो वहां पर जीवन में तीन चार शादियां आम बात है.. इसके अलावा कितने live in, contract marriage and single mothers हैं, कहना बडा मुश्किल है.. पश्चिम में पारिवारिक जीवन बहुत उलझा हुआ है.. हमारे यहाँ फिर भी हालात कुछ ठीक हैं..

माने जैसा कैसा भी हो, मेरा तो यही है.. लड़ाई करता है, नाराज होता है पर मेरा तो यही है.. एक ही है, यही है.. बहुत खर्च करती है, बहुत चिकचिक करती है, मेरी माँ से भी लडती है पर मेरी तो यही है.. जैसी भी है, यही है.. भारत में यह भाव रहता है..

पश्चिम वाले नकली प्यार करते हैं, बस बदन से प्यार करते हैं.. एक दूसरे की कमी को सहन नही करते..

हे भारतवासियों, तुम्हारा भी कश्मीर से नकली प्यार है क्या? सालों, बस कश्मीर के बदन से प्यार करते हो क्या? बस श्रीनगर, गुलमरग की सुंदर घाटी से प्यार करते हो क्या? बस अनंतनाग की नदियों से प्यार करते हो क्या? सब भारतीय लोग कश्मीर से नकली प्यार करते हैं..

असली प्यार करते तो कश्मीरी लोगों के साथ भी संवेदना होती.. हजारों कश्मीरी मर चुके हैं, हजारों रेप और मानवाधिकार हनन का तो क्या कहना.. आम कश्मीरी की रोज की परेशानी का तो क्या कहना.. सात लाख फौजी किसी छोटे से इलाके के सीने पर खड़े हो जाए और वो फौजी अफसपा कानून से सुरक्षित हों, जिसे चाहे चांटा मार दिया, एक आध सैनिक ने किसी महिला से खराब व्यवहार कर दिया,किसी ने विरोध किया तो गिरफ्तार कर लिया, गोली मार दी… पर किसी भारतीय के मन में लकीर नही उठती.. पिछले हफ्ते पाँच कश्मीरी लौंडे मरे, गोलियाँ लगकर.. किसी भारतीय के मन में पीडा, दुख, संवेदना नही हुई.. आगे से कहते हैं कि और मारो.. जो आजादी माँगता है, मारो.. हमारे लोग कश्मीर में मौत पर दाँत फाडकर हँसते हैं.. हाहा, यह लगी गोली, मिल गई आजादी.. ठां ठां , दो गोली और.. दो और आजादी..

हम सब कश्मीर से नकली प्यार करते हैं.. बस उसके बदन से प्यार करते हैं, बस नक्शे में हमारे साथ चाहिए.. कश्मीरी लोगों की किसी को परवाह नहीं, मरें तो मरें..

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Liberalism and We

Mutazir told me that this platform will be about liberal mouthpieces. The phrase “Liberal mouthpieces” is very delighting as liberal is the one word, very close to my heart. This word has in itself, the future of a forward looking humanity. Liberal word, is a guarantee for tolerance and secularism. Even though dictionary has a certain definition for Liberalism, I believe that for everyone, liberal word has a different meaning. Some people associate it with sexual liberty, some others with curiosity; some others with expressive liberty and yet same others extend the liberty up to insanity but that is alright. Liberty treats every school of thought with honour, even let it be conservative which is exactly contradictory.

To erase the confusion, if someone wants to summarize the whole concept of Liberalism, the phrase “Live and let live” will be most appropriate.

Well, for me Liberty is curiosity. I associate liberalism with bombardment of questions on every sphere of life like Rutherford bombarded a beam of alpha particles on the gold foil in his famous experiment. My liberalism is asking questions.

And I ask simple ones. Is killings of civilians in Kashmir justified? Should I be afraid to say it against my country? And then the simpler ones. Should it be a crime to hurt religious sentiments? Oh come on. Sentiments are hurt everywhere, everyday. Ask that hungry fellow on street and he’ll tell that his religious sentiments have been hurt by the whole society by declining him food and brotherhood.

Conservatives believe what they are taught, liberals do ask questions. They ask why the apple has fallen from tree downwards? They ask why day and night comes? They don’t care about ancient shit that day and night comes by some big devil opening and closing his ass. Yes, Wright brothers were liberals. They were told again and again that a piece of iron doesn’t fly. They believed it can and now everyone believes it.

As a liberal, I dare to ask something to all of us. Is it good to hate each other just because you live in some part of Punjab called Pakistan and Myself in some part of Punjab, in India? Our divide is 70 years old, our unity is 3000. Those 3000 years have seen the fall and rise of many empires. Ashoka came, Guptas came, Ghulams came, Lodhi came, Mughals came, Britishers came and then came this system of governance.

If that strong empire of Ashoka and even stronger of Akbar was not permanent, should we believe that this system of governance with exist forever? If it was not Mughal empire forever, if it was not British empire forever, shall we believe that it will be India and Pakistan forever? Everything came, everything lived, everything faded. If something passed the test of time, that is our Sanjhi virasat.

So, to all the liberals connected to this platform, I want to give you a question before putting myself off.

Should we have more love for the political ideology which teaches us to hate each other or more love and loyalty to this Indus valley which has held us together, through all the kings and governances, through all the centuries and millenniums?

Jai Hind.

  • Written for Jahaliyat.com

 

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माहौल बडी तगडी चीज है.. जहाँ का माहौल बना, आदमी वहीं चल देता है.. मान लो मेले में दो तमाशे हो रहे हैं, एक तमाशे को बीस लोग देख रहे हैं, दूसरे को दो चार लोग.. आप स्वाभाविक रूप से बीस लोगों की भीड़ में जाकर वह तमाशा देखेंगे…. अगर दूसरे वाले को मुकाबला करना है तो दो तरीके हैं.. या तो अगले दिन आकर सुबह सुबह ही अपनी दुकान पर माहौल बना ले या फिर दस पाँच भाड़े के लौंडे लाकर दुकान पर खड़े कर ले.. खैर..

मैं, लाल कृष्ण आडवाणी की जीवनी पढ रहा था.. १९५२ की बात सुना रहे थे.. राजस्थान के एक गाँव में वो भारतीय जन संघ के चुनाव प्रचार के सिलसिले में गए.. वहाँ से चुनावी उम्मीदवार आडवाणी जी को बोला कि परेशान होने की कोई जरूरत नहीं.. मैं जरूर जीतूंगा.. आडवाणी जी ने पूछा कि कैसे जीतोगे? वो बोला कि मैं गुर्जर हूँ और अपनी जाति से इकलौता उम्मीदवार हूँ..सब गुर्जर मुझे ही वोट देंगे.. इसके अलावा दूसरी जाति के लोग भी मुझे ही वोट देंगे.. आडवाणी जी ने पूछा कि दूसरी जाति के लोग क्यों वोट देंगे?

बोला कि सब जानते हैं मैं ही जीतूंगा.. इसलिए हारने वालों पर कोई वोट खराब नही करेगा.. बस मुझे अपनी जीत का माहौल बनाए रखना है.. सब खेल माहौल का है..

अब आजकल opinion poll का फैशन है.. चुनाव के असली नतीजों से पहले ही किसी को विजेता घोषित कर दिया जाता है.. भाजपा जीत रही है.. सौ में से नब्बे सीट जीत रही है.. ऐतिहासिक रूप से जीत रही है.. माहौल बना दिया जाता है.. भाजपा जीत गई समझो, बस ताजपोशी बाकी है.. वैसे तो न्यूज चैनल अपने पोलस को ईमानदारी से इकट्ठा किया बताते हैं पर क्या भरोसा? उन्हें कोई बीस करोड दे दे तो गलत पोल दिखाने में क्या ग़म है? माहौल ही तो बनाना है..

अगर न्यूज चैनलों ने सच में बिहार में पोल किया था तो भाजपा कैसे हारी? अगर सच में पोल कुछ ईमानदार लोगों ने किया था तो दिल्ली में भाजपा को बीस सीट भी क्यों न मिली? कश्मीर घाटी में क्यों एक सीट भी न मिली?

मतलब साफ है.. पोल से कोई जनमत नही दिखाया जाता.. बस एक माहौल बनाना है..हवा चलानी है..आपको बस मीडिया वालों की जेब भरनी है, वो रात को नौ बजे वाले प्रोग्राम में कह देंगे कि भाजपा भारी बहुमत से जीत रहा है.. ऐतिहासिक रूप से जीत रहा है..वो कह देंगे कि सब विरोधियों की छुट्टी हो चुकी है, सब भाग चुके हैं.. मैदान ए जंग हो चुकी समझो, नतीजा आ चुका समझो, भाजपा जीत चुकी समझो.. इसी चाल में बहुत से शरीफ आदमी वोट गलत दे जाते हैं..

ओपीनियन पोल भी कहीं न कहीं मुक्त व साफ चुनाव में बाधक हैं..

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मान लीजिए आप रोज दो तीन बार नहाते हैं.. सुबह सुबह आँगन को चार पाँच बाल्टी पानी डालकर धोते हैं.. फिर पाईप लेकर कार को चमकाते हैं और फिर भैंस गाय बकरी का नंबर आता है.. मने आप रोज पाँच सात सौ लीटर पानी यूज करते हैं.. और अचानक आपके गाँव में पानी की सपलाई कम हो जाए तो क्या हो? अगर आपको कार धोने का पानी न मिले, भैंस पर पांच सात बाल्टी डालने को न मिले, आँगन में सूखी झाडू लगाकर गुजारा करना पडे तो आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे की सूखा पड गया.. जीना कठिन हो गया, दुषवार हो गया…
पर ध्यान दिया जाए कि अभी आपके पीने के पानी का कोई संकट नही है, खाना बनाने का कोई संकट नही है.. संकट है तो बस यही कि बहाने को फिजूल पानी नही है.. this is called self generated draught..अगर आप पानी पीने की बजाय, बकरी नहलाने लगें तो उसे कहेंगे रिसोरस मिस मेनेजमेंट..

हमारा एक राज्य है, राजस्थान.. साल में 400mm बारिश होती है पर वहाँ से सूखे की खबर नही आती.. हमारा एक राज्य है, राजस्थान.. वहाँ नदियों की संख्या बहुत कम है.. पर वहाँ सूखा पडने वाली राष्ट्रीय आपदा घोषित नही होती.. वहाँ भूमि में जल का स्तर बहुत नीचे है पर फिर भी आत्महत्या का दिल दहलाने वाला आँकड़ा नही आता..
अब महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाडा की बात की जाए, 1200mm औसत बारिश है, सलाना.. नदियाँ भी हैं.. भारत में सबसे ज्यादा बाँध भी महाराष्ट्र में हैं, दो हजार के करीब बडे बाँध हैं.. पर वहाँ क्यों सूखा पड गया? वहाँ क्यों पीने का पानी भी रेल में भरके जाने लगा? क्यों हजारों पशु पानी और चारे की कमी में मर गे?

चीनी ने कडवाहट फैलाई है..सौ से ज्यादा चीनी मिल हैं.. महाराष्ट्र में केवल चार प्रतिशत जमीन पर गन्ने की खेती होती है पर सारे पानी का सत्तर प्रतिशत उसमें यूज होता है.. मराठवाडा में गन्ना मुख्य फसल है.. दनादन दनादन पानी मांगती है. ना मिले तो सूख जाती है, किसान फंदे पर झूल जाता है.. बुद्धिजीवी वर्ग बहुत समय से सरकारों के कंधे झकझोर रहा है, गन्ना किसानों से कुछ और उगाने की फरियाद कर रहा है….. पर ये चूतिया जाहिल अनपढ़ नेतागण चीनी मिल पे मिल खोल जा रहे हैं.. दनादन रिबन काटे जा रहे हैं.. महाराष्ट्र में एक दौर ऐसा आया था, जब चीनी मिल खोलकर नेता लोग चुनाव जीता करते थे..

अब जाकर ठोकर लगी..अब जाकर मराठवाडा में नई चीनी मिल खोलने पर बैन लगाया.. मुझे महाराष्ट्र के लोगों के साथ संवेदना है पर नेताओं के खिलाफ रोष भी है.. वहाँ पर भगवान ने सूखा नहीं दिया है.. Maharashtra created a draught for itself, it’s most severe case of resource mis management.. Maharashtra made a self generated draught.

हरियाणा वाले भी चावल की फसल पर बहुत नाज करते हैं.. पछताना पडेगा..