Aside
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गर्मी चरम पर है, दोपहर में पारा 45 को छूता है.. गरम लू बदन को कंपाती जाती है, भगवान न करे किसी को ऐसी दोपहरी में घर से निकलना पडे.. भगवान न करे ऐसी दोपहरी में कोई रिक्शा चलाए, भगवान न करे ऐसी दोपहरी में कोई ईंटे ढोए, कोई सडक पर वजन खींचे..

ऐसी दोपहरी में कोई अपनी छोटी सी रेहडी लेकर धूप में खडा रहे और हम बडी दुकान में जाकर कोका कोला पी लें? कोई दोपहर में जलते बदन हमें रिक्शा से ढोए और हम कहें कि क्यों बे लालची, ठग, तीस रूपये माँगता है? बीस दूंगा, लेना है तो बोल..

एक तरफ बडी कंपनियों, सेठों के पेट निकलते जाते हैं.. दूसरी तरफ गरीबों का सफाया हुआ जाता है.. वैसे ठीक भी है, ना रहे बाँस, ना बजे बाँसुरी.. ना रहे गरीब, ना रहे गरीबी.. बडा कष्टदायी है कि हम सब लोग बडी दुकानों पर दौड़ कर चढते हैं, वेटर को बीस रूपये टिप ना दें तो शर्म आए..

गरीब की दुकान ग्राहक का इंतजार करती रह जाती है.. उसके साथ बडा मोल भाव किया जाता है.. उस फटे चप्पल वाले को ठग बोला जाता है.. हमें सोचना चाहिए..

मैने तो सीधा फंडा बनाया हुआ है.. आस पास के सब रेहडी वालों से अपनी यारी है.. एक गन्ने के जूस वाला है, बडा गरीब है.. मैं रोज अपने एक दो मित्रों को लेकर जाता हूँ, उसके पचास रूपये जरूर बनवाकर आता हूँ.. एक परांठे वाली दीदी है, उससे मेरी दोस्ती एक साल पुरानी है.. बडे मस्त परांठे बनाती है, दस का एक.. मैने लड झगड कर पंद्रह देना शुरू किया हुआ है.. एक केले वाला भाई है, दस के तीन केले देता है.. मैं रोज जाता हूँ, दस के दो ही लेता हूँ.. एक चाचा बडा बुजुर्ग है, उससे भी हर हफ्ते सिर की मालिश करा लेता हूँ.. एक भुटटे वाला है, करारे भुटटे बेचता है.. चार चार लड़कियाँ हैं, उसकी.. मैने बहुत जोर लगाया, भाई इनका स्कूल में दाखिला करा दे.. कापी पैन बसता भी लाके दिया पर उस अनाडी ने दाखिला नी कराया.. रब जाने चालाक है या भोला.. खैर.. कोला पिए जमाना हो गया, आइसक्रीम का भी शौक नही.. पिजजा भी नी खाता.. बडे सेठों को एक एक पैसा देते मेरे हाथ कांपते हैं.. हाँ, उनकी दुकान पर सफाई करने वाली चाची को जरूर कभी चुपके से बीस तीस रूपये पकडा देता हूँ..

मानता हूँ, गरीबी मेरे मिटाए ना मिटेगी.. वो दस बीस रूपये उसके एक वक्त की सब्जी भी न खरीद पाएँगे.. पर अच्छा लगता है.. सिर थोड़ा सा उठ जाता है, मिजाज खुश हो जाता है.

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